“गीत गोविन्द” में मुख्यरूप से श्रृंगार रस और भक्ति रस को प्राधान्य माना गया है। इसके अंतर्गत चौबीस (२४) अष्टपदियाँ है। इनके गायन हेतू कवि ने मालव, गुर्जर, बसंत, रामक्री (रामकली), कर्णार, देशाख्य, देशवराड़ी, गुणकली, गौड़मालव, भैरवी, विभास, आदि रागों का उल्लेख किया है। इसमें से अनेक राग आज प्रचलन में नहीं है।

संगीत शास्त्र में संयोग श्रृंगार के लिए काफी, कान्हड़ा, पूरिया, श्री, पीलू, बहार, ललित, खमाज आदि रागों का प्रयोग किया जाता है। वियोग श्रृंगार के लिए बसंत, दरबारी कान्हड़ा, यमन कल्याण, मल्हार आदि रागों का उपयोग होता है।

जयदेव मधुरा भक्ति और श्रृंगार के कवि माने जाते है। अतः उन्होंने उसके अनुरूप रागों का प्रयोग किया है। जयदेव के गीत गोविन्द का प्रमुख स्वर श्रृंगार है। यहाँ राधा पूर्व की स्मृतियों को याद कर मिलन सुख का अनुभव करती है। वन में विचरण कर रहे कृष्ण की बाँसुरी के सुमधुर स्वरों को याद करती है। इस भाव से पूर्ण अष्टपदी के गायन हेतू कवि ने राग गुर्जर का समर्पक और अभिप्रायपूर्ण प्रयोग किया है। जहाँ राधा कृष्ण से मिलने के लिए व्याकुल होकर अपनी सखी से पीड़ा का वर्णन करती है, वहाँ जयदेव ने रस के अनुरूप मालव राग का उपयोग किया है। शास्त्रीय संगीत में मालव राग उत्तम शैली का राग है, इसका गायन समय संध्या काल माना जाता है।

कवि जयदेव ने वियोग-श्रृंगार के लिए गुणकली का उपयोग किया है। इसमें निबद्ध अष्टपदी है—
पश्चती दिशी दिशी रहसि भवंतम्।
तदधरमधुरमधूनी पिबन्तम्।
नाथ हरे। जयनाथ हरे। सीदतिराधाऽऽवासगृहे॥

इस प्रकार जयदेव ने राग वराडी और देशाख्य राग का भी प्रयोग किया है। इसके अंतर्गत कृष्ण के विरह में ध्यान मग्न राधा का चित्रण है। इसमें राधा की अति दुर्बलतापूर्ण स्थिति तथा हार पहनने में असमर्थता व्यक्त की गई है।

जयदेव — “ललित लवंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे॥”
इस अष्टपदी में राग बसंत का प्रयोग किया है।

“चन्दन चर्चित नील कले वसीत वरून वनमाली॥” जैसी रचना में रामकली राग का प्रयोग किया है।

संक्षेप में कह सकते है कि जयदेव जी शास्त्रीय संगीत के ज्ञानी थे। उनको रागों का ज्ञान था। इसलिए उन्होंने गीत गोविन्द की रचना करते समय अनुकूल रागों का प्रयोग करके उसमें उत्कृष्ट रसनिष्पत्ति की है।

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