वैदिक काल से भारत देश कला और संस्कृति की भूमि रहा है। सामवेद से यह कला प्रस्फुटित हुई, ऐसा मानना अतिश्योक्ति नहीं है। सप्तसुरों को गाने का समय, उसकी रचना पद्धति, स्वरों का चढाव उतार, इन सबका विस्तृत विवरण सामवेद में पढ़ने को मिलता है। शिवशंकर का तांडव नृत्य और मधुर वीणा वादक नारद इस प्राचीन परंपरा के अंग है। संगीत की यह धरोहर आज हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के रूप में हम तक पहुंची है। शास्त्रीय संगीत में गायन को श्रेष्ठतम कला का दर्जा दिया गया है। नादब्रह्म की उपासना ईश्वर तक पहुँचने का सरल सोपान है। ओंकार के निनाद से आत्मतत्व परतत्व के साथ एक रूप होता है।
गायन कला की प्रस्तुति एकल और जुगलबंदी के स्वरुप में होती है। जुगलबंदी, इस शब्द द्वय में दो अर्थ निहित है। जुगल शब्द का अर्थ है, दो वस्तुएं और बंदी शब्द का तात्पर्य है जुड़ा हुआ। अर्थात दो वस्तुएं या व्यक्ति जब एक साथ, एक समय पर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये हुए समन्वय के साथ प्रस्तुति देते है, उसे जुगलबंदी कहा जाता है।
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में जुगलबंदी गायन, वादन, नृत्य सभी में सुनने और देखने को मिलती है। अगर हम गायकों की जुगलबंदी की बात करें तो इसमें, जुगलबंदी-कर्ताओं का प्रस्तुति देने का अलग-अलग अंदाज़ होता है। इसी प्रणाली में जब जुगलबंदी का एक गायक अपने विचारों का प्रस्तुतीकरण करता है तो उसी से मिलता जुलता विचार दूसरे गायक को भी प्रस्तुत करना पड़ता है। और इसी प्रकार पूरे राग का प्रस्तुतीकरण नियमावली के अंतर्गत होता है।
जुगलबंदी: पंडित भीमसेन जोशी व डॉ बालमुरली कृष्ण, यमन-कल्याण।
इस चलचित्र में गायकों की जुगलबंदी का श्रेष्ठ उदहारण है, जिसमें पं. राजन और साजन मिश्र अपनी प्रस्तुति दे रहे है।
इसी प्रकार अगर हम गायक और वादक की जुगलबंदी की चर्चा करे, तो इसमें गायक की भूमिका प्रबल होती है। जिस प्रकार गायक राग को प्रस्तुत करता है, उसी प्रकार वादक को उसका साथ देते हुए राग के स्वरुप को स्थापित करना पड़ता है। लेकिन एक बात का दोनों कलाकारों को विशेष ध्यान रखना होता है कि जुगलबंदी प्रतियोगिता का रुप न ले। तभी प्रस्तुति सफलता अर्जित करती है।
इस विडियो में गायक और वादक की जुगलबंदी का श्रेष्ठ उदहारण है। जिसमें उस्ताद राशिद खान और उस्ताद शाहिद परवेज़ प्रस्तुति दे रहे है।
जुगलबंदी के प्रत्येक प्रकार में कलाकार एक दूसरे को भलीभांति जानते और समझते है। इसीलिए अपनी प्रस्तुति को सुन्दर बनाने के लिए कलाकार न केवल अपने गायन-वादन में समन्वय रखते है, परन्तु उस प्रस्तुति को रोचक भी बनाते हैं।
इन्ही बातों से एक घटना का स्मरण होता है। सन १९९५ में ग्वालियर के संगीत समारोह के दौरान दो दिग्गज कलाकारों का आगमन हुआ। उनमें एक थे उस्ताद जाकिर हुसैन और दूसरे थे पं. राजन और साजन मिश्र। कार्यक्रम का आरम्भ मिश्र बंधू के गायन से हुआ। तत्पश्चात जाकिर साहब का एकल तबला वादन शुरू हुआ, उनके साथ हारमोनियम पर श्री. महमूद धोलपुरी थे। करीब दस मिनिट तक लहरे की संगत नहीं जम पाई। तभी दर्शको में बैठे हुए मिश्र बन्धु में से राजन मिश्र उठे और मंच की तरफ चल पड़े, मंच पर पहुंचकर हारमोनियम हाथ में लिया और संगत शुरू कर दी। लेकिन विनम्रता इतनी की धोलपुरी जी को मंच पर ही बिठाए रखा। कार्यक्रम लग-भग दो से ढाई घंटे तक चला। उस्ताद जी का तबला और पंडित जी की हारमोनियम पर संगत ऐसी जमी मानो इस दुनिया से सब कुछ परे हो। जुगलबंदी की वह शाम जीवन भर के लिए अविस्मर्णीय है। उस प्रस्तुति में दोनों कलाकारों का समन्वय देखने योग्य था।
इस विडियो में पं. हरिप्रसाद चौरसिया और उस्ताद जाकिर हुसैन की जुगलबंदी है। जिसमें सवाल जवाब प्रकार का अद्भुत नमूना है।
अंततः जिस प्रकार दोनों नेत्रों से हम वस्तु के एकाकार स्वरुप का अनुभव करते है, उसी प्रकार जुगलबंदी में भी दो व्यक्तित्व भिन्न-भिन्न प्रतिभा के धनी एकात्म स्वरुप में रसिकजनों को स्वरों का आनंद देते है।